हे साथी! यह जग मन का है
आना जाना बनना बिगड़ना,
सब कुछ यह है मन कि रचना,
जैसा सोच हुजूर,
वही होगा मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है।
बनता कोई कभी किसी का,
बिछड़ जाता कोई किसी का,
सच यही है हुजूर,
हो या ना हो मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
आज यहाँ कोई रहता दिखता,
पलक झपक में गुम हो जाता,
खोजते फिरो हुजूर,
नहीं होगा मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
राजा भरत भी हिरन बना था,
अंबा शिखंडी बन युद्ध लड़ा था,
मन का खेल हुजूर,
चिंतन हुआ मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
एक काल में जो जोगी था,
आगे चलकर राज्य किया था,
चिंतन जैसा हुजूर,
हुआ वही मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
राजा पदम भी युद्ध में मरा था,
देह त्याग फिर राज्य रचा था,
लिला कही हूजूर,
कैसे हुआ मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
पनिहारिन जिसे जन्म दिया था,
पुनः जन्म उससे ब्याह रचा था,
नियति खेले हुजूर,
चाह हुआ मंजूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
चिंतन इसलिए उसी का कर लो,
अलख-निरंजन मन में भरलो,
हो तुम वही हुजूर,
आनंद रहा भरपूर,
हे साथी! यह जग मन का है ।
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