कोई है ? जो मेरा सुने!
भोर हुआ निंद उडी,
मन में उठा विचार।
दिनभर की काज का,
मिलि गया आधार।।
व्यवहार में है लग गया,
मुझ को दिया बिसार।
मैं तो यूँ चिलाता रहा,
कोई है ? जो मेरा सुने!
कभी यह सोचा नहीं,
उठा था जहाँ से विचार।
वह अविचल मैं कौन हूँ,
जो हर काज का आधार।।
काज में उलझा रहा,
कर्ता स्वयं को जान।
मैं अनहद नाद सुनाता रहा,
कोई है ? जो मेरा सुने!
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