वैराग्य


यह जो दिखता है सब बदलता है,
अन्त में कुछ भी काम न आता है,
ये जानता हुआ भी फिर मानव,
इन में वैराग्य क्यों नहीं लाता है ।

जंगल हो चाहे सिर्फ झोपडी हो,
मन विषयन संग क्यों रमता है,
इन विषयन के विष मादक में,
अपना जीवन क्यों यह खोता है ।

जाना हुआ सब सदा नहीं होता,
कोई कहीं आता है और जाता है,
ये अजब रंजिश है दिवाने की,
यहाँ अपने और पराये बनाता है ।

अजब मोह जाल है परमेश्वर की,
जब इसके चक्कर में फँसता है,
ना होता हुआ भी यह संसार,
नित नई ख्वाब जरुर लाता है ।

इस दृश्य परपंच की माया से,
वह धीर पुरुष ही  है सदा छुटा,
जो गुरु मुख से बहती गंगा को,
नित हृदय पटल में समाता है ।

 


No comments:

Post a Comment