बापू !तेरे नज़रों को


बापू !तेरे नज़रों को,
कोई समझ न पाये ।
तेरे नूरे गुलजार को,
कोई जान न पाये ।
जताते है खबर अपनी,
मंजिल-ए-सितम की,
तेरे अंदाज अनोखीहै,
रेमत-ए-करम की,
वे परे है इस दुनियावी,
रागों विरागों से,
भरे है वे हरदम सिर्फ,
खूदायी निगाहों से,
न जाने कौन पहचाने,
इन निगाही करम को,
फिक्र आदम की हरते है,


जो हरते है फिक्रत-ए-आदम,
और दिलाते है खुदा-ए-आराम ।





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