हरि ! मैं तो सेवक, सदा ही हूँ उदासी ।
तुम हो दीन बंधू, सबके अंतर उर वासी ।
सदा संग हो रहते, सदा ही ध्यान रखते ।
सदा ही मेरी मुश्कील, हल तुम हो करते ।
न जानू तेरी इस, अदा को मैं गुरुवर ।
बेचैन मन मे तुम, सदा हो उमंग भरते ।
दिल में तुम रह कर, दिल की बात सुनते ।
दिलबर जो दाता हो, दिल-ए-हाल सुनाते ।
तेरी इस रहमत देख, खामोश क्यों हूँ मैं ।
न जानूं मेरे बापू, क्यों उदास हूँ मैं ।
ॐ......ॐ.....ॐ......ॐ.........ॐ
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