हे तम के नाशक ! हे प्रभो !
अज्ञान का भी नाश हो,
सुज्ञान सुधा का पान कर,
सर्व तम का नाश हो ।
ज्ञानाग्नी की प्रकाश हो,
सर्वात्म आनन्द घोश हो,
ज्ञानीयों के पथ पे चल,
संसार से हम उदास हो ।
उदासीनता तुम दे बढा,
विश्व का न खयाल हो,
सर्व का, सारे विश्व का,
निज एक में ही मेल हो ।
जाना आना न हो कहीं,
मन के भ्रम का नाश हो,
सर्वात्म ही का दृष्टी धर,
‘अहं’ ‘त्वं’ का नाश हो ।
हे तम के नाशक ! हे प्रभो !
अज्ञान का भी नाश हो,
सर्वात्म अनुसंधान कर,
विज्ञान सत्य प्रकाश हो ।
जाये मति की तम जहाँ,
सर्वोपरि है सम जहाँ,
आत्मा ही सदा आत्मा ही है,
ना है कोई विषम जहाँ ।
हे प्रतिपाल ! तू प्रतिपाल कर,
सदगुरु का हमेशा ध्यान हो ,
सदगुरु के ज्ञान प्रकाश से,
सारा विश्व प्रकाश हो ।
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