यारो! हम न मरे
जब मेरा न तन था,
वन ही बस वन था,
ना कोई जीवन था,
तब भी तो मैं था।
जब चाँद रौशन था,
मेरा तन एक कण था,
साँसों का न धडकन था,
तब से तो मैं था।
चाँदनि जब बरसि,
धरति थी तरसि,
पौधों में है वर्षि,
तब मैं पोधों में था।
पौधों से हुआ धान,
धान से हुआ भोजन,
जीवों के अंतर में,
मैं एक कण था।
पिता के उदर से मैं,
माँ में है स्थित था,
नव मास के अंत में,
मेरा एक तन था।
खेल ही जीवन था,
निर्दोष मेरा मन था,
छोटा सा नट-खट ,
तब वह बचपन था।
खुन की थी गर्माहट,
फौलादी थी जोश,
मन था मद होश,
तब वह जुवानी थी।
ढलति हुई जीवन,
बिखरती हुई बचपन,
साँसों की मुर्झाहट,
तब वह बुढापा था।
तन जब था छुटा,
ममता का घट फूटा,
छोड़ मैं मेरा का,
त्यागा जीवन था।
परिस्थिती सब है बदलि,
मेरा रुप भी था बदला,
मगर जो मैं पहले था,
अब भी तो वही हूँ।
अविरत यह चक्र चलता रहा,
मन बुद्धी काया बदलता रहा,
जन्मता रहा जीवन,
मरती रही मौतें,
मगर, यारो! हम न मरे
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