तुम्हे छोड
कर, यूँ ना भुल जाऊँ,
इस जहां में ओ
सदगुरु !
यह जहां तो
है, मन का बसेरा,
इसे मैं
जानपाऊँ,
ओ मेरे सदगुरु
!
हर पल बनता,
हर पल बिगडता,
यह खेल मृषा
है ओ सदगुरु !
इसमें सत
बुद्धि कर, मैं ना फँस जाऊँ,
ऐसी कृपा तू
करना,
ओ मेरे सदगुरु
!
मैं भूला हूँ,
नहीं जानता हूँ,
तेरी महिमा को
ओ सदगुरु !
इस तम को दूर
करना,
ओ मेरे सदगुरु
!
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