ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।
तुम ढूँडन फिरी मुझे,
जग में नैन निहारी री,
मैं तो तुझ में ही समाई री।
ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।।
तुम ढूँडन चाहि मुझे,
जग की नाद सुनाई री,
मैं तुझ में ही अनहद बजाई री।
ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।।
तुम ढूँडन गई मुझे,
रसना को स्वाद चखाई री,
मैं तुझमाहि नित रस जगाई री।
ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।।
तुम ढूँडन करी मुझे,
फूल की गंध सुंगाई री,
मैं तो तेरा आनंद खुमारी री।
ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।।
तुम रंगन चाहि मुझे,
जग कि रंग लगाई री,
मैं तुझे मेरे रंग में ही रंगाई री।
ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।।
मैं तो हूँ अंतर्यामि,
संग साथ सदा तोरी,
चलि तुम मोहे बिसारी री।
ओ मय्या मोरी,
मोहे ढूँडन कहाँ चलि री।।
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